भाभी, भैया और मैं मुम्बई में रहते थे। मैं उस समय पढ़ता था। भैया अपने बिजनेस में मस्त रहते थे और खूब कमाते थे। मुझे तब जवानी चढ़ी ही थी, मुझ तो सारी दुनिया ही रंगीली नजर आती थी। जरा जरा सी बात पर लण्ड खड़ा हो जाता था। छुप छुप कर इन्टरनेट पर नंगी तस्वीरे देखता था और अश्लील पुस्तकें पढ़ कर मुठ मारता था। घर में बस भाभी ही थी, जिन्हें आजकल मैं बड़ी वासना भरी नजर से देखता था। उनके शरीर को अपनी गंदी नजर से निहारता था, भले ही वो मेरी भाभी क्यो ना हो, साली लगती तो एक नम्बर की चुद्दक्कड़ थी।

क्या मस्त जवान थी, बड़ी-बड़ी हिलती हुई चूंचियाँ! मुझे लगता था जैसे मेरे लिये ही हिल रही हों। उसके मटकते हुये सुन्दर कसे हुये गोल चूतड़ मेरा लण्ड एक पल में खड़ा कर देते थे।

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काफी देर हो चुकी थी उस रात को ऑफिस से रवाना होते हुए। मैंने जल्दी-जल्दी अपनी साड़ी ठीक की और ऑफिस का दरवाज़ा बंद कर के चली। मेरी कार पार्किंग में दूर अँधेरे कोने में अकेली खड़ी हुई थी। बहुत ज़ोरों से बारिश हो रही थी और बादल भी जम कर गरज रहे थे। मैं पूरी तरह भीग चुकी थी और ठंडे पानी से मेरे ब्लाऊज़ के अंदर मेरे निप्पल एकदम टाईट हो गयी थी। मेरा ब्लाऊज़ मेरे रसीले मम्मों को ढाँकने की नाकामयाब कोशिश कर रहा था। मेरे एक-तिहाई मम्मे ब्लाऊज़ के लो-कट होने की वजह से और साड़ी के भीग जाने से एकदम साफ़ नज़र आ रहे रहे थे। मैंने साढ़े चार इन्च ऊँची हील के सैण्डल पहने हुए थे और पानी मे फिसलने के डर से धीरे-धीरे चलने की कोशिश कर रही थी। हवा भी काफ़ी तेज़ थी और इस वजह से मेरा पल्लू इधर-उधर हो रहा था जिसकी वजह से मेरी नाभी साफ़ देखी जा सकती थी। मैं आमतौर पे साड़ी नाभी के तीन-चार ऊँगली नीचे पहनती हूँ। पूरी तरह भीग जाने की वजह से, मैं हक़ीकत में नंगी नज़र आ रही थी क्योंकि मेरी साड़ी मेरे पूरे जिस्म से चिपक चुकी थी। ऊपर से मेरी साड़ी और पेटीकोट कुछ हद तक झलकदार थे।

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कैसे दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनो में बदल गये, मानो पता ही नहीं चला. अचानक ही एक दिन रूपाली को एहसास हुआ कि हवेली के चारों तरफ झाड़-घास-फूस बढ़ गये हैं. रूपाली को खुद पर गुस्सा आने लगा कि क्यूँ इतने वक़्त से उसने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया.

आँगन में आकर उसने चंदर को आवाज़ लगाई,”चंदर……ओ चंदर.” तभी उसने देखा वो पेड़ के नीचे बैठा है और पेड़ पे बैठे कबूतर को एकटक निहार रहा है. एकदम गुम सूम…….रूपाली को गुस्सा आ गया. वो पास गयी और चिल्लाते हुए चंदर से कहने लगी कि उसकी आँखें फुट गयी हैं क्या? उसे रोज़ सफाई करते रहना चाहिए ताकि हवेली सॉफ सुथरी बनी रहे. हाथ हिला हिला कर उसने चंदर को सफाई करने के लिए कहा.

चंदर ने एक नज़र उसकी तरफ देखा और रूपाली ने देखा चंदर की आँखों में रूपाली के लिए सिर्फ़ नफ़रत थी. वो अचानक उठा और तेज़ी से भौचक्की सी रूपाली के आगे से निकल गया और दूर कहीं गुम हो गया. रूपाली के होंठो तक चंदर के लिए एक भद्दी से गाली आई, पर वो मंन मार कर रह गयी.

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मुम्बई के जुहू बीच पर बना एक खूबसूरत बंगला,
रात के लगभग डेढ़ बजे का वक्त,
बंगले के चारों तरफ 6 फिट ऊँची बाऊन्ड्री-वॉल.
और इसी बाऊन्ड्री-वॉल के पास,
“चलें….”-एक फुसफुसाती आवाज।
“पहले बीड़ी तो खत्म होने दे….”-दूसरी मध्यम आवाज।
लगभग एक मिनट बाद,
“चल….”
दोनों ने पारदर्शी मास्क पहना और बाऊन्ड्री-वॉल के ऊपर चढ़ गये।
“कूदूं…..”
“हर चीज पूछ कर करेगा क्या….कूद..”
‘धप्प्’
‘धप्प्’
दोनों लॉन के किनारे ऊँगी झाड़ियों में उलझे पड़े थे।
“तेरी माँ का चोदू साले ……तुझे यही जगह मिली थी कूदने के लिये!”
“गलती हो गई भाई…..दिन में तो निशान लगया था लेकिन बारिस की वजह से…..”
“चुपकर…..”
दोनों जैसे-तैसे झड़ियों से आजाद हुये।

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यह कहानी है सक्सेना परिवार की। इस परिवार के मुखिया, सुदर्शन सक्सेना, ४५ वर्ष के आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक हैं। आज से २० साल पहले उनका विवाह ज्वाला से हुआ था। ज्वाला जैसा नाम वैसी ही थी। वह काम (सैक्स) की साक्षात दहकती ज्वाला थी। विवाह के समय ज्वाला २० वर्ष की थी। विवाह के १ साल बाद उसने एक लड़की को जन्म दिया। आज वह लड़की, रंजना १९ साल की है और अपनी मां की तरह ही आग का एक शोला बन चुकी है। ज्वाला देवी नहा रही हैं और रंजना सोफ़े पर बैठी पढ़ रही है और सुदर्शन जी अपने ऑफिस जा चुके हैं। तभी वातावरण की शांति भंग हुई। कॉपी, किताब, अखबार वाली रद्दी..!!!!!! ये आवाज़ जैसे ही ज्वाला देवी के कानों में पड़ी तो उसने बाथरूम से ही चिल्ला कर अपनी १९ वर्षीय जवान लड़की, रंजना से कहा, बेटी रंजना! ज़रा रद्दी वाले को रोक, मैं नहा कर आती हूँ।

अच्छा मम्मी! रंजना जवाब दे कर भागती हुई बाहर के दरवाजे पर आ कर चिल्लाई।

अरे भाई रद्दी वाले! अखबार की रद्दी क्या भाव लोगे?

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मैं सामाजिक कार्य में बहुत रुचि लेती हूँ, सभी लोग मेरी तारीफ़ भी करते हैं. मेरे पति भी मुझसे बहुत खुश रहते हैं, मुझे प्यार भी बहुत करते हैं. चुदाई में तो कभी भी कमी नहीं रखते हैं. पर हाँ उनका लण्ड दूसरों की अपेक्षा छोटा है, यानि राहुल, रोशन, गोवर्धन, गोविन्द के लण्ड से तो छोटा ही है. पर रात को वो मेरी चूत से ले कर गाण्ड तक चोद देते हैं, मुझे भी बहुत आनन्द आता है उनकी इस प्यार भरी चुदाई से.

पर कमबख्त यह विपिन, क्या करूँ इसका? मेरा दिल हिला कर रख देता है. जी हाँ, यह विपिन मेरे पति का छोटा भाई है, यानि मेरा देवर… जालिम बहुत बहुत कंटीला है… उसे देख कर मेरा मन डोल जाता है. मेरे पति लगभग आठ बजे ड्यूटी पर चले जाते हैं और फिर छः बजे शाम तक लौटते है. इस बीच मैं उसके बहुत चक्कर लगा लेती हूँ, पर कभी ऐसा कोई मौका ही नहीं आया कि विपिन पर डोरे डाल सकूँ. ना जाने क्यूँ लगता था कि वो जानबूझ कर नखरे कर रहा है.

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हमारे पड़ोस में एक भाभी रहती है, भाईसाहब की मृत्यु कोई चार वर्ष पहले हो गई थी। भाभी की उम्र कोई 40 के आस पास होगी, लेकिन फिगर अच्छा मेंटेन कर रखा था।

उनका लड़का एक लड़की को लेकर भाग गया, छोटी लड़की की अभी पिछले वर्ष ही शादी कर दी है। लड़की की शादी के बाद भाभी जी हर महीने गोवर्धन परिक्रमा लगाने के लिए जाती थी, उनके साथ मैं भी जाता था। वहीं का किस्सा मैं सुनाने जा रहा हूँ।



हर महीने की तरह जनवरी में हम लोग गोवर्धन के लिए निकले। भाभी को अगले दिन कहीं जाना था, सो उन्होंने कहा- आज जल्दी चलते हैं ताकि शाम के समय ही परिक्रमा पूरी कर लें और सुबह पहली बस पकड़ कर वापिस आ जायेंगे।

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यह कहानी तब की है जब मैं पढ़ती थी, मैं अपने माँ बाप की अकेली लड़की थी और लाडली भी थी। हमारे पड़ोस में पवन नाम का लड़का अपने मम्मी पापा के साथ रहता था, मुझसे 5 साल बड़ा था, वो मुझे बहुत लाइन मारता था, कभी मुझे पकड़ कर चूम लेता, कभी मेरे चूचे दबाता तो कभी पीछे से मेरी गांड को रगड़ता था। मैं कभी उसे मना नहीं करती, बस शरमा कर मुस्कुरा देती थी।

कई बार मैं उनके घर में जाती थी तो एक दिन पवन घर में अकेला था, उसने मुझे अन्दर बुलाया और मुझसे लिपट गया और अपना काम करने लगा।



उसने मेरे होटों को चूसना चालू किया और मेरी गांड को मसलता रहा। मैंने छोटी स्कर्ट और टी-शर्ट पहनी थी। मैं अपने आप को नहीं छुड़ा पा रही थी। थोड़ी देर बाद मुझे थोड़ा अच्छा लगने लगा।

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मैं दिल्ली की रहने वाली हूँ। जो किस्सा मैं आपको सुनाने जा रही हूँ, वोह कुछ साल पहले मेरे साथ मेरे कॉलेज के प्रथम वर्ष में हुआ था।

कॉलेज शुरू करने पर मेरा बस से आना जाना बढ़ गया। कॉलेज का पहला साल था। स्कूल से निकल कर मिली हुई आज़ादी का पहला पहला स्वाद था। दिल्ली की बसों में चलने की आदत भी पड़ने लगी, और मज़ा भी आने लगा। वैसे तो दिल्ली की बसें लड़कियों के लिए मुसीबत भरी होती हैं, इतनी भीड़ होती है, ऊपर से भीड़ में हर मर्द आशिक बन जाता है।



वैसे तो कॉलेज जाना शुरु होने से पहले से ही दिल्ली की बसों में कोई न कोई अंकल हमेशा कभी मेरे मम्मे दबा देते, तो कभी मेरी चूत सहला देते।

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मेरा नाम शेरू है. मैं बीस साल का एक जवान लड़का हूं. मैं अपने मामाजी के यहां रहता हूं. पिछले तीन महने से मैं अपनी मामी कमल और उसकी सहेली रीना के साथ सम्भोग कर रहा हूं. दोनों ३५ साल की चुदैल औरतें हैं और मेरे ९ इंच के लंड पर फ़िदा हैं. जब भी मौका मिलता है, दोनों मुझसे मरवाने आ जाती हैं.

एक दिन मुझे रीना की गांड मारते हुए देख कर मेरी मामी ने बड़े आश्चर्य से पूछ कि मेरा इतना बड़ा लंड वह कैसे अपनी संकरी गांड में लेती है. मेरी मामी ने मेरा ९ इंच का लवड़ा रीना की गांड में जाते हुए देखा. रीना बोली कि दर्द तो होता है पर मस्त मोटे लंड से गांड मराने में मजा भी बहुत आता है. कमल मामी ने भी कई बार गांड मराई थी पर छेटे लंडों से. मेरे मामा भी हमेशा उसकी गांड मारते थे पर अपने ५ इंच के बचकाने लंड से.



रीना बोली “कमल तू घवरा मत देख कितनी आसानी से शेरु का हलबी लंड मेरी गांड में जा रहा है. सिर्फ़ थूक लगा कर डाला है इसने. तू तो पहले भी गांड मरवा चुकी है फ़िर क्यों डरती है?”

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