मेहनत करते जमुनी कभी थकती नही थी। यह तो उसका रोज का काम था। बस सड़क की सफाई करते-करते वह ऊब गई थी। अब वह किसी बड़े काम की तलाश में थी जहां वह ज्यादा पैसा कमा सके। कमाई कुछ बढे तो उसके लिए अपने निठल्ले पति का पेट भरना और उसकी दारू का इंतजाम करना थोडा आसान हो जायेगा।

शहर से कुछ दूर एक बहुमंजिला अस्पताल का निर्माण हो रहा था। जमुनी की नजर बहुत दिनों से वहां के काम पर थी। वहां अगर काम मिल जाए तो मजे ही मजे! एक बार काम से छुट्टी होने पर वह वहां पहुन्ची भी थी लेकिन बात नही बनी क्योंकि फिलहाल वहां किसी मरद की जरूरत थी। उस दिन देर से घर पहुंची तो प्रतिक्षारत माधो ने पूछ लिया, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी?’’

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मैं हूँ हनी. मैं एक पंजाबन हूँ मेरा शहर अमृतसर है, मेरी उम्र है अठाईस साल। मैं एक बच्ची की माँ भी हूँ, मैंने बी.सी.ए के बाद दो साल की एम.एस.सी-आई टी की, मैं बहुत चुदक्कड़ औरत हूँ, स्कूल के दिनों से मैंने चुदाई का रस चख लिया था, मैंने जिंदगी में कई लंड लिए, लेकिन बच्ची होने के बाद मेरी छोटे लंड से तसल्ली नहीं हो पाती, मेरे पति मुझसे उम्र में काफी बड़े हैं, मैंने उनके साथ घरवालों के खिलाफ जाकर शादी की थी, उनके पास बहुत पैसा था, मैं एक साधारण से घर में पैदा हुई थी, हम तीन बहनें ही हैं, शौक पूरे करने के लिए मैंने शुरु से अमीर लड़कों से चक्कर चलाये थे, पति का बिज़नस बहुत फैला हुआ है, मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं। मैं और मेरे पति ही भारत में थे, इनके दोनों भाई अमेरिका में बिज़नेस करते थे, सासू माँ वहीं रहती, ससुर भी !

शादी के बाद भी मैं चुदाई अपने पति तक ज्यादा देर सीमित नहीं रख पाई थी, उम्र के फर्क की वजह से वो रोज़ रात को मुझे सुख नहीं देते थे, बिज़नस के चलते शहर से बाहर, कभी देश से बाहर भी रहना पड़ता था, मेरी तन की आग नहीं बुझती थी, घर से बाहर निकल कर किसी मर्द से इतनी जल्दी संबंध बनाना सही नहीं था। इनका बहुत नाम था, काफी लोग इनको जानते थे, इसलिए डरती थी, इनको भनक भी पड़ गई मुझे छोड़ ना दें, ऐशो आराम की जिंदगी से कहीं वो मुझे निकाल ना फेंके, घर में कई नौकर थे।

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मेरी उम्र छब्बीस साल है और मैं सरकारी दफ़्तर में ऑडिटिंग ऑफिसर हूँ और हमारे दफ़्तर की शाखायें पूरे देश में हैं और अक्सर मुझे काम के सिलसिले में दूसरे शहरों की शाखाओं में दो-तीन महीनों के लिये जाना पड़ता है। मैं शादीशुदा नहीं हूँ इसलिये मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं होती है।

एक बार मुझे काम के सिलसिले में तीन महीने के लिये लखनऊ शाखा जाना पड़ा। वहाँ के दफ़्तर में मेरी सहकरमी ‘रूबिना’ थी जो कि सीनियर क्लर्क थी। उसकी उम्र बत्तीस-तेत्तीस साल की थी और उसकी शादी को आठ साल हुए थे। उसके शौहर बहरीन में दो साल से सर्विस कर रहे थे। रूबिना बेहद खूबसूरत थी और उसका फिगर ३६-३०-३८ था। उसका भरा-भरा सा जिस्म बेहद सुडौल था और मैं तो उसके चूतड़ों पर बहुत फिदा था। वो जब ऊँची हील की सेंडल पहन कर चलती थी तो गाँड मटका-मटका कर चलती थी। रुबिना काफी बनठन कर दफ्तर आती थी। एक महीने में ही काम के दरमियाँ काफी घुलमिल गयी थी। वो मुझे ‘सर’ कह कर बुलाती थी क्योंकि वो मुझसे जुनियर थी। मैं भी उम्र में उससे छः-सात साल छोटा होने की वजह से उसे ‘रूबीना जी’ कह कर बुलाता था ।

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सुबह से ही बॉस का मूड बिगड़ा हुआ था। वजह मालूम नही पड़ रही थी। मैं सानिया हमीद, मुम्बई में एक कम्पनी में सेक्रेटरी का काम करती हूँ। मेरे बॉस, राहुल अरोड़ा, का काम गवर्नमेन्ट के ठेके लेना है। टेन्डर के ज़रिये गवर्नमेन्ट ठेके देती है और मेरे बॉस आफ़िसरों को पैसे खिला पिला कर अपना काम निकलवाते हैं। उनका दिल्ली बेस होना उनके काम में काफी मदद करता है। ज्यादातर कान्ट्रैक्ट दिल्ली से पास होते है और दिल्ली में ही आफ़िसरों को खुश करने के लिये शराब, कबाब और शबाब का मज़ा लूटने देते हैं।

“सर, क्या बात है आज आप काफी परेशान दिखाई पड़ रहे हैं?” मैंने केबिन में घुसते ही पूछ लिया।

“हाँ सानिया! आज कुछ ज्यादा ही परेशान हूँ…,” बॉस ने काफी संजीदा होते हुए कहा, “किसी ने हमारी कम्पनी की शिकायत दिल्ली में कर दी है।”

“किस चीज़ की शिकयात, सर?” मैंने चेयर पर बैठते हुए कहा।

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काफी देर हो चुकी थी उस रात को ऑफिस से रवाना होते हुए। मैंने जल्दी-जल्दी अपनी साड़ी ठीक की और ऑफिस का दरवाज़ा बंद कर के चली। मेरी कार पार्किंग में दूर अँधेरे कोने में अकेली खड़ी हुई थी। बहुत ज़ोरों से बारिश हो रही थी और बादल भी जम कर गरज रहे थे। मैं पूरी तरह भीग चुकी थी और ठंडे पानी से मेरे ब्लाऊज़ के अंदर मेरे निप्पल एकदम टाईट हो गयी थी। मेरा ब्लाऊज़ मेरे रसीले मम्मों को ढाँकने की नाकामयाब कोशिश कर रहा था। मेरे एक-तिहाई मम्मे ब्लाऊज़ के लो-कट होने की वजह से और साड़ी के भीग जाने से एकदम साफ़ नज़र आ रहे रहे थे। मैंने साढ़े चार इन्च ऊँची हील के सैण्डल पहने हुए थे और पानी मे फिसलने के डर से धीरे-धीरे चलने की कोशिश कर रही थी। हवा भी काफ़ी तेज़ थी और इस वजह से मेरा पल्लू इधर-उधर हो रहा था जिसकी वजह से मेरी नाभी साफ़ देखी जा सकती थी। मैं आमतौर पे साड़ी नाभी के तीन-चार ऊँगली नीचे पहनती हूँ। पूरी तरह भीग जाने की वजह से, मैं हक़ीकत में नंगी नज़र आ रही थी क्योंकि मेरी साड़ी मेरे पूरे जिस्म से चिपक चुकी थी। ऊपर से मेरी साड़ी और पेटीकोट कुछ हद तक झलकदार थे।

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यह उस समय की बात है जब मैं 20 साल का था। मैं तब लॉ की पढ़ाई कर रहा था।

मेरे माता-पिता बहुत ही धार्मिक विचारों के हैं और हमेशा धर्म-करम में लगे रहते हैं।

हम दो भाई और एक बहन हैं, बहन की शादी पहले ही हो गई है।

मेरे बड़े भाई का रेडीमेड कपड़ों का कारोबार है और अक्सर वो अपने काम के सिलसिले में दूसरे शहर में टूर पर जाते रहते हैं।

बड़े भाई की शादी को सिर्फ़ एक साल ही हुआ था।

मेरी भाभी मुझको बहुत चाहती थीं.. क्योंकि एक मैं ही तो था.. जिससे भाभी बातचीत कर सकती थीं।

खास कर जब भैया.. बिजनेस के काम से टूर पर बाहर जाते थे।

मेरी भाभी बहुत प्यार से हमारा ख्याल रखती थीं और कभी यह अहसास नहीं होने देतीं कि मैं घर पर अकेला हूँ।

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जब मैं बिहार में मोतिहारी में रहता था तब कॉलेज़ में था तब मेरे मकान मालिक की बहु जो बांझ थी उसका नाम प्रतिमा ठाकुर था। वो थी तो पतली दुबली मगर थी मस्त भौजाई! ऐसी भौजाई जिसका कोई जवाब नहीं है। यह तब की बात है जब मैंने अपने जीवन में सेक्स को महसूस किया था। मोतिहारी में स्कूल जाते वक्त मैं अक्सर बुकस्टाल पर रुकता था और वहां पर रखी किताबें देखता था। उसमें मुझे खासकर हिंदी में आज़ादलोक, अंगड़ाई, हवस की कहानियाँ, मस्तराम मौलाना, जैसी किताबें देखता था, कभी लेने की हिम्मत नहीं पड़ती थी।

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मुम्बई के जुहू बीच पर बना एक खूबसूरत बंगला,
रात के लगभग डेढ़ बजे का वक्त,
बंगले के चारों तरफ 6 फिट ऊँची बाऊन्ड्री-वॉल.
और इसी बाऊन्ड्री-वॉल के पास,
“चलें….”-एक फुसफुसाती आवाज।
“पहले बीड़ी तो खत्म होने दे….”-दूसरी मध्यम आवाज।
लगभग एक मिनट बाद,
“चल….”
दोनों ने पारदर्शी मास्क पहना और बाऊन्ड्री-वॉल के ऊपर चढ़ गये।
“कूदूं…..”
“हर चीज पूछ कर करेगा क्या….कूद..”
‘धप्प्’
‘धप्प्’
दोनों लॉन के किनारे ऊँगी झाड़ियों में उलझे पड़े थे।
“तेरी माँ का चोदू साले ……तुझे यही जगह मिली थी कूदने के लिये!”
“गलती हो गई भाई…..दिन में तो निशान लगया था लेकिन बारिस की वजह से…..”
“चुपकर…..”
दोनों जैसे-तैसे झड़ियों से आजाद हुये।

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मेरा नाम सैन्डी है, मैं दिल्ली में रहता हूं। कुछ साल पहले की बात है मैं करोल बाग मार्केट में कुछ खरीददारी कर रहा था, किसी ने मुझे पीछे से आवाज़ दी। देखा तो सुनीता खड़ी थी। बहुत खूबसूरत एक नवविवाहिता जैसी लग रही थी – हाथों में चूड़ा, गले में मंगलसूत्र और माथे पर सिन्दूर लगाया हुआ था।

सुनीता मेरी गर्लफ़्रेन्ड थी। कुछ महीने पहले हमारा अलगाव हो गया था, अलगाव क्या बस उसकी शादी कहीं और हो गई थी। वो 24 साल की एक स्मार्ट और बोल्ड लड़की थी। करीब एक साल हमारा अफ़ेयर खूब चला… इस बीच किस तो आम सी बात हो गयी थी। हम लोग घंटो नेहरू पार्क मैं बैठे एक दूसरे को चूमते रहते। मैं उसकी शर्ट मैं हाथ डालकर उसके बूब्स दबाता रहता और वो मेरी पैंट की जिप खोलकर मेरे लंड से खेलती रहती।

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मेरी बी.ऐ की परीक्षा ख़तम हो गई थी। मै अपनी चचेरी दीदी के यहाँ घूमने नैनीताल गया। उनसे मिले हुए मुझे कई साल हो गए थे। जब में सातवीं में पढता था तभी उनकी शादी फौज के रणवीर सिंह के साथ हो गई। अब वो लोग नैनीताल में रहते थे। मेंने सोचा चलो दीदी से मिलने के साथ साथ नैनीताल भी घूम लूँगा। वहां पहुँचने पर दीदी बहूत खुश हुई।



बोली – अरे तुम इतने बड़े हो गए। मैंने तुम्हे जब अपनी शादी में देखा था तो तुम सिर्फ़ ११ साल के थे।

मैंने कहा – जी दीदी अब तो मै बीस साल का हो गया हूँ।

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