मेरी मेरिज को लगभग १४ साल हो चुके है इन १४ सालो में अब तो मै अपने पति से ही चुदती थी पर अब उनके डायबिटीज हो गई थी और काफ़ी बढ़ भी गई थी। इसी कारण से उन्हें एक बार हृदयघात भी हो चुका था। अब तो उनकी यह हालत हो गई थी कि उनके लण्ड की कसावट भी ढीली होने लगी थी। लण्ड का कड़कपन भी नहीं रहा था। उनका शिश्न में बहुत शिथिलता आ गई थी। वैसे भी जब वो मुझे चोदने की कोशिश करते थे तो उनकी सांस फ़ूल जाती थी, और धड़कन बढ़ जाती थी। अब धीरे धीरे ब्रिजेश से मेरा शारीरिक सम्बन्ध भी समाप्त होने लगा था।

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भाभी, भैया और मैं मुम्बई में रहते थे। मैं उस समय पढ़ता था। भैया अपने बिजनेस में मस्त रहते थे और खूब कमाते थे। मुझे तब जवानी चढ़ी ही थी, मुझ तो सारी दुनिया ही रंगीली नजर आती थी। जरा जरा सी बात पर लण्ड खड़ा हो जाता था। छुप छुप कर इन्टरनेट पर नंगी तस्वीरे देखता था और अश्लील पुस्तकें पढ़ कर मुठ मारता था। घर में बस भाभी ही थी, जिन्हें आजकल मैं बड़ी वासना भरी नजर से देखता था। उनके शरीर को अपनी गंदी नजर से निहारता था, भले ही वो मेरी भाभी क्यो ना हो, साली लगती तो एक नम्बर की चुद्दक्कड़ थी।

क्या मस्त जवान थी, बड़ी-बड़ी हिलती हुई चूंचियाँ! मुझे लगता था जैसे मेरे लिये ही हिल रही हों। उसके मटकते हुये सुन्दर कसे हुये गोल चूतड़ मेरा लण्ड एक पल में खड़ा कर देते थे।

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मेरा नाम इम्तियाज़ है। बात उन दिनों की है जब मेरी उम्र 19 साल की थी और मैं इंजीनियरिंग के पहले साल में बंगलौर में पढ़ रहा था। मैं बनारस का रहने वाला हूँ। मेरे एक्जाम समाप्त हो गए थे तो कुछ दिनों की छुट्टियों में घर आया था। हमारा संयुक्त परिवार है, मेरे परिवार के अलावा मेरे चाचा एवं चाची भी साथ में ही रहते थे। मेरे चाचा पेशे से सैनेटरी वेयर के थोक विक्रेता थे, उन्होंने काफी पैसा कमा रखा था। उनकी शादी को कई साल हो गए थे लेकिन अभी तक कोई संतान नहीं थी। चाची की उम्र 29 साल की थी, वो पास के ही एक गाँव की हैं ! थी तो देहाती पर मस्त चीज थी, उनकी जवानी पूरे शवाब पर थी, झक्क गोरा बदन और कंटीले नैन नक्श और गदराये बदन की मालकिन थी, चाचा चाची ऊपर की मंजिल में रहते थे।

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जबसे उसने सुना की महेश आ रहा है, वो बड़ी खुश थी. तरह तरह के पकवान बनाने में सबेरे से जुटी थी. शादी के बाद पति चंदर के साथ शहर आ गयी थी. शहर भी कह नहीं सकते थे उसे. मुंबई के पास एक नवी मुंबई शहर बन रहा था. नए शहर में काफी बिल्डिंगें बन रही थी. चंदर एक कोन्त्रक्टोर के यहाँ सूपरवाइज़र था. तनख्वाह ठीक ठाक थी. बेटी तारा के जन्म के बाद चंदर ने नसबंदी करा ली थी. वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था, परन्तु समझदार था. शादी के बाद जब तक की उसकी आमदनी नहीं बढ़ी उसने कोप्पर-टी का प्रयोग करवाया था. तारा शादी के चार साल बाद जन्मी थी.

दोपहर में घर काटने को दौड़ता था. पड़ोस की औरतों से वो घुल मिल नहीं पायी थी. पति और बच्ची ही उसका सारा संसार थे. उनके एक रिश्तेदार थे मुंबई में. लेकिन शहर की भाग-दौड में उनसे भी महीनों में कभी मिल पाते थे. चंदर ने उसे एक मोबाइल फोन दिया हुआ था जिससे की वो गांव में जब रहा नहीं जाता, कॉल कर लेती थी. लेकिन वो भी उसके अकेलेपन को काटने के लिए काफी नहीं था. ऐसे में कल शाम चंदर ने उसे बताया की महेश आ रहा है. उसे काफी खुशी हुई की चलो उसे भी बतियाने के लिए कोई मिल जायेगा, कुछ दिन तो मन लगा रहेगा!

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काफी देर हो चुकी थी उस रात को ऑफिस से रवाना होते हुए। मैंने जल्दी-जल्दी अपनी साड़ी ठीक की और ऑफिस का दरवाज़ा बंद कर के चली। मेरी कार पार्किंग में दूर अँधेरे कोने में अकेली खड़ी हुई थी। बहुत ज़ोरों से बारिश हो रही थी और बादल भी जम कर गरज रहे थे। मैं पूरी तरह भीग चुकी थी और ठंडे पानी से मेरे ब्लाऊज़ के अंदर मेरे निप्पल एकदम टाईट हो गयी थी। मेरा ब्लाऊज़ मेरे रसीले मम्मों को ढाँकने की नाकामयाब कोशिश कर रहा था। मेरे एक-तिहाई मम्मे ब्लाऊज़ के लो-कट होने की वजह से और साड़ी के भीग जाने से एकदम साफ़ नज़र आ रहे रहे थे। मैंने साढ़े चार इन्च ऊँची हील के सैण्डल पहने हुए थे और पानी मे फिसलने के डर से धीरे-धीरे चलने की कोशिश कर रही थी। हवा भी काफ़ी तेज़ थी और इस वजह से मेरा पल्लू इधर-उधर हो रहा था जिसकी वजह से मेरी नाभी साफ़ देखी जा सकती थी। मैं आमतौर पे साड़ी नाभी के तीन-चार ऊँगली नीचे पहनती हूँ। पूरी तरह भीग जाने की वजह से, मैं हक़ीकत में नंगी नज़र आ रही थी क्योंकि मेरी साड़ी मेरे पूरे जिस्म से चिपक चुकी थी। ऊपर से मेरी साड़ी और पेटीकोट कुछ हद तक झलकदार थे।

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यह उस समय की बात है जब मैं 20 साल का था। मैं तब लॉ की पढ़ाई कर रहा था।

मेरे माता-पिता बहुत ही धार्मिक विचारों के हैं और हमेशा धर्म-करम में लगे रहते हैं।

हम दो भाई और एक बहन हैं, बहन की शादी पहले ही हो गई है।

मेरे बड़े भाई का रेडीमेड कपड़ों का कारोबार है और अक्सर वो अपने काम के सिलसिले में दूसरे शहर में टूर पर जाते रहते हैं।

बड़े भाई की शादी को सिर्फ़ एक साल ही हुआ था।

मेरी भाभी मुझको बहुत चाहती थीं.. क्योंकि एक मैं ही तो था.. जिससे भाभी बातचीत कर सकती थीं।

खास कर जब भैया.. बिजनेस के काम से टूर पर बाहर जाते थे।

मेरी भाभी बहुत प्यार से हमारा ख्याल रखती थीं और कभी यह अहसास नहीं होने देतीं कि मैं घर पर अकेला हूँ।

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कैसे दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनो में बदल गये, मानो पता ही नहीं चला. अचानक ही एक दिन रूपाली को एहसास हुआ कि हवेली के चारों तरफ झाड़-घास-फूस बढ़ गये हैं. रूपाली को खुद पर गुस्सा आने लगा कि क्यूँ इतने वक़्त से उसने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया.

आँगन में आकर उसने चंदर को आवाज़ लगाई,”चंदर……ओ चंदर.” तभी उसने देखा वो पेड़ के नीचे बैठा है और पेड़ पे बैठे कबूतर को एकटक निहार रहा है. एकदम गुम सूम…….रूपाली को गुस्सा आ गया. वो पास गयी और चिल्लाते हुए चंदर से कहने लगी कि उसकी आँखें फुट गयी हैं क्या? उसे रोज़ सफाई करते रहना चाहिए ताकि हवेली सॉफ सुथरी बनी रहे. हाथ हिला हिला कर उसने चंदर को सफाई करने के लिए कहा.

चंदर ने एक नज़र उसकी तरफ देखा और रूपाली ने देखा चंदर की आँखों में रूपाली के लिए सिर्फ़ नफ़रत थी. वो अचानक उठा और तेज़ी से भौचक्की सी रूपाली के आगे से निकल गया और दूर कहीं गुम हो गया. रूपाली के होंठो तक चंदर के लिए एक भद्दी से गाली आई, पर वो मंन मार कर रह गयी.

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मुम्बई के जुहू बीच पर बना एक खूबसूरत बंगला,
रात के लगभग डेढ़ बजे का वक्त,
बंगले के चारों तरफ 6 फिट ऊँची बाऊन्ड्री-वॉल.
और इसी बाऊन्ड्री-वॉल के पास,
“चलें….”-एक फुसफुसाती आवाज।
“पहले बीड़ी तो खत्म होने दे….”-दूसरी मध्यम आवाज।
लगभग एक मिनट बाद,
“चल….”
दोनों ने पारदर्शी मास्क पहना और बाऊन्ड्री-वॉल के ऊपर चढ़ गये।
“कूदूं…..”
“हर चीज पूछ कर करेगा क्या….कूद..”
‘धप्प्’
‘धप्प्’
दोनों लॉन के किनारे ऊँगी झाड़ियों में उलझे पड़े थे।
“तेरी माँ का चोदू साले ……तुझे यही जगह मिली थी कूदने के लिये!”
“गलती हो गई भाई…..दिन में तो निशान लगया था लेकिन बारिस की वजह से…..”
“चुपकर…..”
दोनों जैसे-तैसे झड़ियों से आजाद हुये।

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मैं दक्षिण भारत में सत्तर के दशक में पैदा हुआ. मेरे पिता मिल में काम करने वाले एक सीधे साधे आदमी थे. उनमें बस एक खराबी थी, वे बहुत शराब पीते थे. अक्सर रात को बेहोशी की हालत में उन्हें उठा कर बिस्तर पर लिटाना पड़ता था. पर मां के प्रति उनका व्यवहार बहुत अच्छा था और मां भी उन्हें बहुत चाहती थी और उनका आदर करती थी.

मैंने बहुत पहले मां पर हमेशा छाई उदासी महसूस कर ली थी पर बचपन में इस उदासी का कारण मैं नहीं जान पाया था. मैं मां की हमेशा सहायता करता था. सच बात तो यह है कि मां मुझे बहुत अच्छी लगती थी और इसलिये मैं हमेशा उसके पास रहने की कोशिश करता था. मां को मेरा बहुत आधार था और उसका मन बहलाने के लिये मैं उससे हमेशा तरह तरह की गप्पें लड़ाया करता था. उसे भी यह अच्छा लगता था क्योंकि उसकी उदासी और बोरियत इससे काफ़ी कम हो जाती थी.

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मैं सामाजिक कार्य में बहुत रुचि लेती हूँ, सभी लोग मेरी तारीफ़ भी करते हैं. मेरे पति भी मुझसे बहुत खुश रहते हैं, मुझे प्यार भी बहुत करते हैं. चुदाई में तो कभी भी कमी नहीं रखते हैं. पर हाँ उनका लण्ड दूसरों की अपेक्षा छोटा है, यानि राहुल, रोशन, गोवर्धन, गोविन्द के लण्ड से तो छोटा ही है. पर रात को वो मेरी चूत से ले कर गाण्ड तक चोद देते हैं, मुझे भी बहुत आनन्द आता है उनकी इस प्यार भरी चुदाई से.

पर कमबख्त यह विपिन, क्या करूँ इसका? मेरा दिल हिला कर रख देता है. जी हाँ, यह विपिन मेरे पति का छोटा भाई है, यानि मेरा देवर… जालिम बहुत बहुत कंटीला है… उसे देख कर मेरा मन डोल जाता है. मेरे पति लगभग आठ बजे ड्यूटी पर चले जाते हैं और फिर छः बजे शाम तक लौटते है. इस बीच मैं उसके बहुत चक्कर लगा लेती हूँ, पर कभी ऐसा कोई मौका ही नहीं आया कि विपिन पर डोरे डाल सकूँ. ना जाने क्यूँ लगता था कि वो जानबूझ कर नखरे कर रहा है.

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